Data Sheet And References

 

  1. वामपंथी छात्रों ने जेएनयू में 2013 में महिषासुर शहादत दिवस मनाया था जिसमें देवी ‍दुर्गा का अपमान किया गया था। [1]
  2. असुर जनजाति के लोगो द्वारा महिषासुर को अपना पूर्वज माना जाता है [2]
  3. महिषासुर दिवस Theory [3]
  4. कोलकाता में दुर्गा प्रतिमा बनाने वाले कारीगर वेश्यालय से थोड़ी मिट्टी जरूर लाते है।वेश्याऐं दुर्गा को अपनी कुल देवी मानती हैं। इसलिए दुर्गा प्रतिमा बनाने में वेश्यालयों से मिट्टी लाने का चलन है।[3]
  5. ऋग्वेद के छठे मंडल के 27वें सूक्त में वरशिखा नामक “असुर” का उल्लेख मिलता है, ऋग्वेद में असुरों को मायावी यानि तब के विज्ञान अर्थात् माया शक्ति और तन्त्र शक्ति से समृद्ध माना है [4]
  6. पर ऋग्वेद काल में मगर उस काल खंड में वर्ण व्यवस्था नहीं होने से जातियों का प्राकट्य नहीं हुआ था। जाति व्यवस्था तो सभ्यता के विकास के बहुत बाद मनु से उपजी, इसलिए महिषासुर के दलित होने की बात गलत साबित होती है [4]
  7. आज जिस स्वरूप में दुर्गा पूजा मनायी जाती है, उसकी शुरूआत महज 260 साल पहले, 1757 में प्लासी के युद्ध के बाद लार्ड क्लाइव के सम्मान में कलकत्ता के नवाब कृष्णदेव ने की थी। इस प्रकार, यह त्योहार न सिर्फ नया है बल्कि इसके उत्स में मुसलमानों का विरोध और साम्राज्यवाद-परस्ती भी छुपी हुई है।[5]
  8. परंतु महिषासुर शहादत दिवस का आयोजन कुछ ही वर्ष पहले शुरू हुआ। सन 2011 में विद्यार्थियों के एक समूह ने जेएनयू में इसका आयोजन किया। [5]
  9. हिषासुर वध को त्योहार के रूप में मनाया जाना दो कारणों से अनुचित है: पहला, यह मृत्यु का जश्न मनाना है और दूसरा, यह महिषासुर के चरित्र की ब्राह्मणवादी व्याख्या को स्वीकार करना है। ब्राह्मणवादी व्याख्या के अनुसार, महिषासुर एक असुर था जबकि अन्यों का कहना है कि वह आदिवासियों का राजा था।[5]
  10. कथा में यह भी बताया गया है कि दानवराज महिषासुर आधा मनुष्य और आधा भैंसा था।जिसके आधार पर महिषासुर को दलित या आदिवासी का पूर्वज बताना गलत होगा [6]
  11. दुर्गा को राजा महिषासुर की हत्या करने में नौ दिन लगे। इन दिनों में देवता महिषासुर के किले के चारों तरफ जंगलों में भूखे-प्यासे छिपे रहे। जिसके कारण दुर्गा को मानने वाले लोगों में आठ दिनों के व्रत-उपवास का प्रचलन है। आठ दिनों तक दुर्गा महिषासुर के किला में रही और और नौवे दिन उसने द्वार खोल दिये और महिषासुर की हत्या हुई। कहानी कहती है कि सवर्णो (?) की बर्बर कार्रवाईयों में बड़ी संख्या मेँ असुर (?) बस्तियाँ जला दी गयी; असुर नागरिकों को निशाना बनाया गया, औरतों का बलात्कार किया गया और बड़े पैमाने पर बच्चों को भी मौत के घाट उतार दिया गया। इन बर्बर कार्यवाहियों से घृणा और आत्मग्लानि से व्यथित, उस स्त्री जिसे दुर्गा कहा गया था..नदी मेँ कूदकर आत्महत्या कर ली.. जिसे विसर्जन का रूप देकर सवर्णो द्वारा महिमामंडित कर दिया गया। अब प्रश्न यह है की विर्जन तो गणेश प्रतिमाओं के भी होते हैं तो क्या वह भी आत्महत्या का प्रतीक प्रदर्शन है? [6]
  12. असुर महिषासुर के नाम पर है ‘मैसूर’ शहर का नाम, नवरात्रि में कुछ लोग मनाते हैं यहां शोक[7]
  13. मिथ्या प्रचार के सिवा कुछ नहीं महिषासुर का महिमामंडन[8]
  14. आखिर क्या है महिषासुर शहादत दिवस?[9]
  15. महिषासुर शहादत दिवस  फैक्ट्स [10]
  16. महिषासुर शहादत दिवस- दलितों के साथ भद्दा मजाक दलित विमर्श के नाम पर[11]

भीमा-कोरेगांव:

  1. भीमा-कोरेगांव का इतिहास [12]
  2. अंबेडकर ने शुरू की समारोह की परंपरा : 1 जनवरी 1927 को बाबा सहेब भीमराम अंबेडकर ने इस स्थान आयोजित कार्यकम में हिस्सा लिया। तब से इस स्थान पर इस दिन को मनाया जाता रहा है।[13]
  3. हर साल जब 1 जनवरी को दुनिया भर में नए साल का जश्न मनाया जाता है उस वक्त दलित समुदाय के लोग भीमा कोरेगांव में जमा होते है. वो यहां ‘विजय स्तम्भ’ के सामने अपना सम्मान प्रकट करते हैं. ये विजय स्तम्भ ईस्ट इंडिया कंपनी ने उस युद्ध में शामिल होने वाले लोगों की याद में बनाया था. इस स्तम्भ पर 1818 के युद्ध में शामिल होने वाले महार योद्दाओं के नाम अंकित हैं. वो योद्धा जिन्हें पेशवा के खिलाफ जीत मिली थी.[14]
  4. इस साल जनवरी में यहां क्या हुआ था और क्यों भिड़की थी हिंसा?

साल 2018 इस युद्ध का 200वां साल था. ऐसे में इस बार यहां भारी संख्या में दलित समुदाय के लोग जमा हुए थे. जश्न के दौरान दलित और मराठा समुदाय के बीच हिंसक झड़प हुई थी. इस दौरान इस घटना में एक शख्स की मौत हो गई जबकि कई लोग घायल हो गए थे. इस बार यहां दलित और बहुजन समुदाय के लोगों ने एल्गार परिषद के नाम से शनिवार वाड़ा में कई जनसभाएं की. शनिवार वाड़ा 1818 तक पेशवा की सीट रही है. जनसभा में मुद्दे हिन्दुत्व राजनीति के खिलाफ थे. इस मौके पर कई बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भाषण भी दिए थे और इसी दौरान अचानक हिंसा भड़क उठी.[14]

  1. ऐसा माना जाता है कि ब्रिटिश सेना में शामिल दलितों (महार) ने मराठों को नहीं बल्कि ब्राह्मणों (पेशवा) को हराया था. बाबा साहेब अंबेडकर खुद 1927 में इन सैनिकों को श्रद्धांजलि देने वहां गए थे.[15]
  2. भीमा कोरेगांव की लड़ाई आज प्रचलित कई मिथकों को तोड़ती हैं. अंग्रेज़ अपने साम्राज्य का विस्तार करने के लिए इस लड़ाई में थे तो वहीं पेशवा अपने राज्य की रक्षा के प्रयास के लिए.
    अंग्रेज़ अपने साम्राज्य को बढ़ाना चाहते थे तो उन्होंने बड़ी संख्या में दलितों को अपनी सेना में भर्ती किया था. इनमें महार, परायास और नमशुद्र कुछ नाम थे. इन वर्गों को उनकी वफादारी और आसान उपलब्धता के लिए भर्ती किया गया था.[15]
  3. बाद में, अंग्रेज़ों ने दलित/महारों को नियुक्त करना बंद कर दिया क्योंकि निम्न पद पर कार्यरत उच्च जाति के सैनिक, दलित अधिकारियों की न तो बातें मानते और न ही उन्हें सलाम करते थे.[15]
  4. इस लड़ाई को लेकर दलित और मराठा समुदाय में लोगों के अलग-अलग तर्क हैं. कुछ जानकार मानते हैं कि महारों के लिए ये अंग्रेजों की नहीं बल्कि अपनी अस्मिता की लड़ाई थी. क्योंकि पेशवा शासक महारों से ‘अस्पृश्य’ व्यवहार करते थे. कुछ इतिहासकार बताते हैं कि दलितों की इतनी बुरी दशा थी कि नगर में प्रवेश करते वक़्त महारों को अपनी कमर में एक झाड़ू बांधकर चलना होता था ताकि उनके पैरों के निशान झाड़ू से मिटते चले जाएं.[16]
  5. उनका मानना है कि महारों ने मराठों को नहीं बल्कि ब्राह्मणों को हराया था. ब्राह्मणों ने छुआछूत दलितों पर थोप दिया था इससे वो नाराज़ थे. जब महारों ने आवाज उठाई तो ब्राह्मण नाराज हो गए. इसी वजह से महार ब्रिटिश फ़ौज से मिल गए.[16]
  6. इतिहास पर नजर डाली जाए तो महारों और मराठों के बीच पहले कभी मतभेद नहीं हुए. मराठों का नाम इसमें इसलिए लाया जाता है क्योंकि ब्राह्मणों ने मराठों से पेशवाई छीनी थी. जिससे मराठा नाराज थे. अगर ब्राह्मण छुआछूत ख़त्म कर देते तो शायद ये लड़ाई नहीं होती[16]
  7. दलित नायकों में ज्योतिबाराव फुले से लेकर बाबासाहेब आंबेडकर तक भारत में ब्रिटिश राज को दलितों के दृष्टिकोण से मुक्तिदायी मानते हैं. उनका मानना है कि अंग्रेजी राज ने आकर जिस राजनीतिक व्यवस्था को उखाड़ फेंका उसका मूल आधार ब्राह्मणवादी था.

विलियम डिग्बी और माइक डेविस के शोध बताते हैं कि अंग्रेजी राज से पहले के इतिहास के उलट गुलाम भारत के दो सौ सालों के दौरान अकाल और भुखमरी की वजह से करोड़ों लोग असमय मौत के मुंह में समा गए. यानी दलित अस्मिता की राजनीति के लिए जो ब्रिटिश राज ‘भला’ था, आम दलितों के लिए वही मौत का कहर बनकर बरपा था.[17]

Reference

  1. http://hindi.webdunia.com/sanatan-dharma-history/mahishasura-mardini-116022600066_1.html
  2. https://www.bbc.com/hindi/india/2009/09/090927_festival_mourners_adas
  3. http://mahishasur.blogspot.com/2016/02/
  4. https://www.jansatta.com/national/debate-rages-over-durga-mahishasura-here-is-the-truth-from-mythology/72666/
  5. https://www.forwardpress.in/2016/03/durga-mahishasur-caste-politics-and-interpreting-mythology-hindi/
  6. https://www.pravakta.com/ideological-war-in-the-name-of-mahishasur/
  7. https://hindi.oneindia.com/religion-spirituality/name-city-mysuru-derived-from-the-name-demon-mahishasura-424247.html
  8. https://naidunia.jagran.com/editorial/expert-comment-glorify-mahishasura-is-an-false-attempt-680600
  9. https://aajtak.intoday.in/story/know-what-is-mahishsuya-shahadat-diwas-1-856585.html
  10. https://makingindiaonline.in/online-news-in-hindi/2017/03/23/smriti-irani-birthday-durga-mahishasur-ma-jivan-shaifaly/
  11. http://tukbandie.blogspot.com/2014/10/blog-post_66.html
  12. https://hindi.firstpost.com/india/bhima-koregaon-history-when-28000-peshwa-soldiers-defeated-by-500-mahars-in-bhima-koregaon-battle-no-78757.html
  13. https://www.livehindustan.com/national/story-bhima-koregaon-war-500-maharaj-defeated-28000-peshwa-in-history-1728448.html
  14. https://hindi.news18.com/news/nation/bhima-koregaon-how-and-why-the-january-violence-snowballed-into-arrest-of-rights-activists-1495342.html
  15. https://www.bbc.com/hindi/india-42554231
  16. https://aajtak.intoday.in/gallery/battle-of-bhima-koregaon-real-story-tst-7-17787.html
  17. http://thewirehindi.com/30698/history-bhima-koregaon-violence-maharashtra-dalit/

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