महिषासुर शहादत दिवस- दलितों के साथ भद्दा मजाक दलित विमर्श के नाम पर

महिषासुर शहादत दिवस की बात करने से पहले आज आप को इतिहास की एक घटना सुनाता हूँ।वैसे तो यह बात ncert की इतिहास की किताबों में भी दर्ज है मगर मेरे एक दोस्त ने मुझसे इसका ज़िक्र यहाँ करने के लिए कहा है।

आज़ादी से काफी पहले की बात है। मैसूर के पास एक रियासत थी त्रावनकोर स्टेट, यहाँ दो जातियां रहती थीं, नायर और नादार। एक अपने क्षेत्र की सर्वोच्च ब्राम्हण और दूसरी दलित।दलित और ब्राह्मण में कोई तो फरक होना चाहिए था सो पंडितों ने कहा या कहें कि एक रिवाज़ बनाया कि दलितों में कोई भी, स्त्री-पुरुष दोनोंकमर से ऊपर कोई कपड़ा आदि नही पहनेंगे।
जी हाँ पूरे गाँव की हर दलित महिला ऐसे ही मालिक लोगों की सेवाएं करती थी। इन सेवाओं में ऐसी बहुत सी सेवाएं थीं जिनकी आप इस समय कल्पना कर रहे होंगे।
ऐसे मे कुछ मिशनरी लोगों ने नयी पीढ़ी के लोगों को समझाया कि वो दलित से इसाई बन जाएँ तो पंडित जी के नियमों को मानने की ज़रुरत ख़त्म।
लोग मान गए और महिलाओं ने ब्लाउज पहनना शुरू किया। सवर्णों को क्या लगा उसे बताने की यहाँ ज़रुरत नही मगर उन्होंने दलितों की पूरी बस्ती जला दी, उन्हें मारा-पीटा और और भी जो कुछ वो वहाँ कर सकते थे किया।मामला अदालत में गया और न्यायाधीश(रियासत के) ने कहा कि सवर्ण स्त्रियों के सामान अपने शरीर के उपरी हिस्से को ढक कर इन्होने बहुत बड़ा पाप किया है और इसका दंड इन्हें मिलना ही चाहिए था।

ऐसी बहुत सी घटनाएं हैं जिन्हें पढ़कर मुझे इस जातीय अस्मिता से घृणा हो गयी है।शायद आप कहें कि आज ऐसा नही होता है। ये तो पिछली सदी की बाते हैं। आज सब बराबर है।
तो कभी शहर उस हिस्से में जाइये जहाँ पिछड़ी या दलित कही जाने वाली जातियां रहतीं हैं। मै गया हूँ, यकीन मानिए जो सोच भी नही सकते हैं हम आप उन सुविधाओं के बिना वो रहते हैं। ये भी ना हो तो ओमप्रकाश वाल्मीकि की जूठन या तुलसीराम की मुर्दाहिया पढ़ कर देखिएगा, सच मानिए हिल जायेंगे।

वैसे एक बात और बताऊं, मेरे एक और ठाकुर मित्र के ही एक रिश्तेदार काफी गर्व से मुझे बता चुके हैं कि, उनके गाँव में दलितों की कोई ऐसी लड़की नही रही जो ‘ठाकुरों, से होकर ना गयी हो.’ और जब एक बार इनलोगों(दलितों) ने अपने दूल्हे की बारात कार में निकाली तो गाँव के ज़िम्मेदार लोगों ने पूरी बारात को पीटा, दूल्हे को मुर्गा बनाया साथ में पूरे खाने में मिट्टी मिला दी।

खैर!

मेरा आज की इस पोस्ट का उद्देश्य ये नही था और मै इस पोस्ट के हेडिंग को बिलकुल भूला नही हूँ। मेरी समस्या यह है कि गीता की ‘धर्म वही है जो लोक कल्याण करे’ वाली सीख को मैंने कुछ ज्यादा ही सीरियसली ले लिया इस लिए मै ना दक्षिणपंथी बन सका न वामपंथी।

दक्षिणपंथ के मेरे मित्रों के पास आज कल गायों को पूजने और पकिस्तान के हिन्दुओं की चिंता करने से ही समय नही है कि वो नारकीय जीवन जी रहे भारतीय लोगों के बारे में सोचें।सड़क के आदमी की बात करने का ठेका अब वामपंथियों ने ले रखा है।इन्डिया गेट पर सरफरोशी की तमन्ना, ओ री चिरय्या गाकर और फेसबुक पर पेज बनाकर इन प्रगतिशीलों ने गरीबों और दलितों की खूब मदद की।ऐसे ही एक मदद की घटना में एक उत्सव शुरू करने की कोशिश की गयी महिषासुर शहादत दिवस, इस उत्सव के पीछे की कथा संक्षेप में कुछ यूँ है,

”’महिषासुर भैंस चरानेवालों का सरदार था। देवताओं को यह बात पसंद नही आई और उन्होंने दुर्गा
(आप देवी दुर्गा कह सकते हैं) को भेजा दुर्गा ने महिषासुर के साथ 8 दिन उसके शयनकक्ष(bed room) में उसके साथ बिताये 
और नवें दिन शराब पीने के बाद खंजर से उसका सीना चीर दिया।”

इस कथा के पीछे कोई रिसर्च नही की गयी, ना कोई तर्क या प्रमाण दिया गया। यहाँतक कि जो संथाली लोककथा इस का आधार बताई गयी उसके जानकारों ने उस कथा में ऐसी कोई बात होने से इनकार कर दिया।

मै एक बार को इस पूरी कल्पना को सच मानने को तैयार हूँ बिना किसी तर्क के, पर मेरा सवाल है कि इससे मेरे शहर में सर पर मैला ढोनेवाली उस औरत के जीवन में क्या फर्क आएगा?
उन बच्चों को क्या मिलेगा उससे, जो स्कूल ना जाकर कूड़े के ढेर से कचरा उठाते हैं?
क्या ढाबे पर झूठी प्लेट धोता छोटू अगर ‘महिषासुर की जय’ बोल देगा तो मालिक उसकी तनखाह बढ़ा देगा?
या आप के ये साबित कर देने से की दुर्गा ने 8 दिन महिषासुर के बिस्तर पर गुज़ारे थे, gb रोड जैसे इलाकों में लाई गई औरतें अपनी जिंदगी जी पाएंगी?
जवाब आप भी जानते हैं और मै भी!

दरअसल चाहे गले में लाल मफलर डालकर सिगरेट फूंकने वाले कामरेड हों या हर बात में अपनी संस्कृति और भावना के आहत हो जाने वाले भक्तजन या फिर वो लोग भी जिन्हें हर बात में सियासी साजिश, अमरीका के नापाक इरादे या ऐसा ही कुछ दिखता रहता हैं ये सब धूमिल की कविता के वही तीसरे आदमी हैं जो ना रोटी पकाते हैं न खाते हैं पर रोटी के साथ खेलते हैं और सबसे ज्यादा कमाते हैं।

वैसे जाते जाते बता दूँ कि फॉरवर्ड प्रेस ने इस महिषासुर उत्सव पर जो पत्रिका निकाली थी उसकी सभी कॉपी पुलिस ने जब्त कर लीं और मामला कोर्ट में है। मेरे पास वो चित्र हैं जो इस पत्रिका में छापे गए हैं पर मै उन्हें यहाँ नही दे सकता। फॉरवर्ड प्रेस के बेचारे लोगों का कहना है कि ये उनकी धार्मिक तथा अभिव्यक्ति की स्वंत्रता पर हमला है और भले ही वापस त्रावन्कोर की तरह एक और संघर्ष हो जाए पर महिषासुर की पूजा तो होनी ही चाहिए।

आप भी सोचिये कि पिछली सदी से आज तक हम एक समाज के रूप में कितना परिपक्व हुए हैं।
मंगल तक राकेट सुनने में अच्छा लगता है मगर इससे मंगल कितना होगा पता नही।


Reference: http://tukbandie.blogspot.com/2014/10/blog-post_66.html

Image Courtesy: Same As Above

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