नर्मदा सरदार सरोवर बांध विस्थापितों की मांग: विस्थापन मंजूर पर पहले हो पुनर्वास

नर्मदा आंदोलन ने पर्यावरण तथा विकास के मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिए हैं कि पहले नर्मदा विस्थापितों को दो हेक्टेयर जमीन के बदले 60 लाख रुपए मुआवजा दिया जाए, तभी सरकार को जमीन खाली कराने का अधिकार होगा. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में ये भी कहा कि जमीन उपलब्ध नहीं होने के कारण जमीन के बदले जमीन देने का प्रस्ताव व्यावहारिक नहीं है. शुरू में आंदोलनकारियों की मांग लोगों के विस्थापन और पर्यावरण विनाश को रोकना था. लेकिन सरकार की हठधर्मिता से लाचार होकर अब उनकी मांग उचित पुनर्वास पर आ टिकी है.

नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध परियोजना का उद्घाटन पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1961 में किया था. गुजरात, मध्य प्रदेश तथा राजस्थान के बीच जल वितरण को लेकर उस दौरान सहमति नहीं बन पाने के कारण परियोजना पर काम शुरू नहीं हो सका. इसके बाद 1969 में सरकार ने नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन किया था. इसके बाद ही नर्मदा घाटी परियोजना पर काम शुरू हुआ. इसमें नर्मदा नदी व उसकी 4134 सहायक नदियों पर गुजरात में सरदार सरोवर बांध तथा मध्य प्रदेश में नर्मदा सागर बांध बनाया जाना है. इसके अलावा 28 मध्यम बांध तथा तीन हजार जल परियोजनाओं का निर्माण भी होना है.

विलंब से बढ़ा परियोजना का खर्च

सरकार का तर्क है कि इस परियोजना से मध्य प्रदेश, गुजरात तथा राजस्थान के सूखा ग्रस्त क्षेत्रों की सवा दो करोड़ हेक्टेयर भूमि को सिंचाई के लिए जल मिलेगा. बिजली का निर्माण होगा, लोगों को पीने का पानी उपलब्ध होगा और क्षेत्र में बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं को भी रोका जा सकेगा. लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है, इस परियोजना से तीन राज्यों की 37 हजार हेक्टेयर भूमि जलमग्न हो जाएगी. सरदार सरोवर से तीन राज्यों के लाखों लोग उजड़ने जा रहे हैं. महाराष्ट्र के करीब चार हजार, गुजरात के पांच हजार और  मध्य प्रदेश के पैंतालीस हजार से अधिक परिवार डूब क्षेत्र में आ रहे हैं. इस परियोजना के विरोध ने धीरे-धीरे एक जन आंदोलन का रूप ले लिया, जो सरकार के लिए परेशानी का सबब बनी है. इस परियोजना की कुल लागत का आकलन अंतिम बार 1999 में किया गया था. तब इसकी लागत 22 हजार करोड़ रुपए आंकी गई थी. कम-से-कम तीन बार कुल लागत का आकलन किया गया है. हर बार यह लागत बढ़ती जा रही है. सरकार इसके लिए आंदोलनकारियों को दोषी ठहराती है. उसका तर्क है कि आंदोलनकारियों के कारण परियोजना शुरू होने में विलंब हो रहा है, जिससे इसकी लागत बढ़ती जा रही है.

डूब आएगी, तब भी नहीं छोड़ेंगे जमीन

1980 में नर्मदा बांध से विस्थापित मध्य प्रदेश के 19 गांवों  के आदिवासियों को गुजरात के जिला नर्मदा के केवाडिया कॉलोनी स्थित पुनर्वास स्थल पर भेजा गया था. 36 साल बाद गुजरात सरकार ने उन्हें पुनर्वास स्थल से दोबारा विस्थापित करने का निर्णय लिया. सरकार ने उनसे कहा कि उन्हें गलत पात्रता के आधार पर लाभ दिए गए. सरकार की इस बेरुखी से नाराज 1000 आदिवासी और किसान केवाडिया कॉलोनी स्थित पुनर्वास कार्यालय के सामने धरने पर बैठे हैं. उनका कहना है कि पुनर्वास स्थल के पास न तो पानी की सुविधा है और न ही जल निकासी व अन्य बुनियादी सुविधाएं ही उपलब्ध हैं. ट्रिब्यूनल अवार्ड के तहत जो सिंचाई का लाभ मिलना था, वह भी पुनर्वास स्थल पर अभी तक नहीं पहुंचा है. अब विस्थापितों ने भी तय कर लिया है कि अगर डूब आएगी, तब भी नर्मदा किनारे से नहीं हटेंगे. वहीं, गुजरात सरकार प्रभावितों की इन समस्याओं का कोई समाधान नहीं निकाल रही है और न ही उनकी शिकायतों पर ध्यान दे रही है.

विस्थापितों को नर्मदा मां का सहारा

छोटा बड़दा गांव के बाहर ग्रामीणों ने एक तख्ती लगा दी है, यहां सिर्फ भूत-प्रेत रहते हैं. सरकार दावा कर रही है कि यह गांव खाली कराया जा चुका है, जबकि ग्रामीण वहां डटे हैं. उन्हें उम्मीद है कि नर्मदा मां उनकी रक्षा करेंगी. सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर कहती हैं कि पुनर्वास के नाम पर आज तक लोगों से सरकार ने झूठे वादे किए हैं. सरकार पहले पुनर्वास और मुआवजे का इंतजाम करे, फिर बांध का निर्माण शुरू करे. वे सैकड़ों महिलाओं के साथ मध्य प्रदेश में बड़वानी ज़िले के छोटा बाड़दा गांव में उचित पुनर्वास की मांग को लेकर नर्मदा में जल सत्याग्रह कर रही हैं. मध्यप्रदेश की नर्मदा घाटी में बड़वानी के पास हजारों महिलाएं जल सत्याग्रह में उनका साथ दे रही हैं. लोगों का कहना है कि सरकार विस्थापितों को मूलभूत सुविधाएं तक नहीं दे रही है. विस्थापितों का आरोप है कि सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिए थे कि अगर पुनर्वास स्थलों पर बुनियादी सुविधाएं मुहैया नहीं कराई जाती हैं, तो वे इसकी शिकायत जीआरए के समक्ष कर सकते हैं. लोगों ने शिकायतें दर्ज कराईं, पर न तो उनकी मांगें सुनी गईं और न ही सुविधाओं में कोई सुधार हुआ.


Reference: http://www.chauthiduniya.com/2017/10/%E0%A4%A8%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%A6%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A4%B0%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%B8%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%B5%E0%A4%B0-%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A7-%E0%A4%B5-dam.html

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