नर्मदा परियोजना- विवादों का पुलिंदा

रविवार, 07 अप्रैल, 2002 

नर्मदा नदी पर बांध बनाने की योजना कुल लागत के हिसाब से भारत की अब तक की सबसे बड़ी योजना है.

मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र में पड़ने वाली नर्मदा घाटी में 30 बड़े, 135 मझोले और 3000 छोटे बांध बनाने की योजना शुरू से ही हर मुद्दे पर विवाद में रही है.

 

नर्मदा परियोजना
•परियोजना 1979 में शुरू हुई
•1200 किलोमीटर लंबी नर्मदा पर 3200 बाँध बनाए जाएंगे
•गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान को फ़ायदा मिलने की उम्मीद
•विरोध करने वालों का कहना है कि दो लाख लोग विस्थापित होंगे
•विश्व बैंक ने 1993 में हाथ पीछे खींचे
•सन् 2025 में पूरी होगी

सरकार का कहना रहा है कि इन बांधों से इस पिछड़े और स्थायी तौर पर सूखा पीड़ित इलाक़े को हरा-भरा बनाया जा सकेगा, साथ ही बिजली भी दूर-दराज़ के गांवों तक पहुंचाई जा सकेगी.

इस नर्मदा घाटी विकास योजना का विरोध करने वालों का कहना है कि इससे उतना लाभ नहीं होगा जितना सरकार बता रही है और इससे कुल मिलाकर नुक़सान ही अधिक होगा.

नर्मदा बचाओ आंदोलन का तर्क है कि यह अनावश्यक रूप से बड़ी योजना है जिसका लाभ सिर्फ़ ख़ास लोगों को ही मिलेगा.

आंदोलनकारियों का ये भी कहना है कि आम तौर पर पूरी दुनिया बनाए गए बड़े बांध कभी उतना फ़ायदा नहीं दे सके जितना दावा किया गया था.

नर्मदा बचाओ आंदोलन का कहना है कि नर्मदा की गोद में बसे सैकड़ों गांवों से कुल मिलाकर लगभग साढ़े तीन लाख आदिवासी लोगों का विस्थापन होगा और उनकी खेती की ज़मीन पानी में डूब जाएगी.

विस्थापित होने वाले लोगों का कहना है कि सरकार ने उन्हें उचित और पर्याप्त मुआवज़ा नहीं दिया है.

सिर्फ़ नर्मदा बचाओ आंदोलन ही नहीं, मध्य प्रदेश की सरकार द्वारा गठित एक दल ने भी माना है कि मुआवज़ा और पुनर्वास का काम किसी तरह से संतोषजनक नहीं कहा जा सकता.

इसके अलावा, केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय के एक विशेषज्ञ दल ने 1993 में अपनी रिपोर्ट में कहा था कि नर्मदा घाटी में बांध के काम के दौरान पर्यावरण की भारी अनदेखी की गई.

वैसे भी, कहा जाता रहा है कि ये योजना पर्यावरण के अनुकूल नहीं है और इतने बड़े पैमाने पर काम होगा तो पर्यावरण के साथ खिलवाड़ भी उसी के अनुपात में होगा.

लागत और लाभ

सरकार के विकास के दावों के विपरीत, आंदोलनकारियों का कहना है कि अगर इस पूरी योजना को वैकल्पिक तरीक़े से लागू किया जाए, इसे छोटी-छोटी आत्मनिर्भर और पर्यावरण के अनुकूल परियोजनाओं में बांट दिया जाए तो ज़्यादा लाभ हो सकता है.

 


कई स्मारक भी डूब गए

इस परियोजना की कुल लागत का आकलन अंतिम बार 1999 में किया गया था तब इसकी लागत 22 हज़ार करोड़ रूपए आंकी गई थी.

कम-से-कम तीन बार कुल लागत का आकलन किया गया है और हर बार यह लागत बढ़ती रही है. हालांकि सरकार इसके लिए आंदोलनकारियों को दोषी ठहराती है कि विलंब के कारण लागत बढ़ी है.

मिसाल के तौर पर सरकार के अनुसार, पूरी लागत गुजरात के सिंचाई बजट का 80 प्रतिशत हिस्सा है. लेकिन इससे कच्छ के लगभग 2 प्रतिशत हिस्से, सौराष्ट्र के 9 प्रतिशत हिस्से में ही पानी पहुंचाया जा सकेगा.

सरकार का कहना है कि इस परियोजना पूरा होने पर पूरे नर्मदा घाटी इलाक़े में बिजली की आपूर्ति की जा सकेगी जिससे विकास की गति बढ़ जाएगी. लेकिन आंदोलनकारी सरकार के इस दावे से सहमत नहीं हैं.

पुनर्वास की समस्या

आंदोलनकारियों का कहना है कि नर्मदा घाटी में डूब के इलाक़े में आने वाले गांवों के लोगों को न तो उपयुक्त ज़मीन दी गई है, न ही उन्हें इतना मुआवज़ा दिया गया है कि वे अपनी ज़िंदगी नए सिरे से शुरू कर सकें.

इस परियोजना के लिए विश्व बैंक कर्ज़ दे रहा था इसलिए अप्रैल 1994 में ब्रैडफ़र्ड मोर्स के नेतृत्व में उसने अपना एक विशेषज्ञ दल नर्मदा घाटी में भेजा.

इस दल ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट में कहा- ”सरदार सरोवर परियोजना गड़बड़ियों से भरी है, मौजूदा तरीक़े से विस्थापन और पुनर्वास का काम पूरा नहीं हो सकता. परियोजना से पर्यावरण पर क्या फ़र्क़ पड़ेगा इसका ठीक से आकलन तक नहीं किया गया है.”

इसके अलावा, बांध की ऊंचाई भी लंबे समय तक विवाद का मुद्दा रहा. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार की मांग पर सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई को बढ़ाकर 90 मीटर तक करने की अनुमति दे दी.

इसे नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर का कहना रहा है कि अगर बांध की ऊंचाई बढ़ाई गई तो कई गांव पूरी तरह डूब जाएंगे.

कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि नर्मदा का विवाद अंतहीन-सा हो चला है.

नर्मदा बचाओ आंदोलन का कहना है कि वे व्यापक राष्ट्रहित में इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं क्योंकि यह परियोजना हर नज़रिए से ग़लत और नुक़सानदेह है. दूसरी ओर, जिन इलाकों और सरकारों को लाभ मिलने की उम्मीद है वे इसका समर्थन कर रहे हैं.

Reference: https://www.bbc.com/hindi/news/020407_issue_narmada_rp.shtml


 

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